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विश्वास -किस पर करें???

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  वर्तमान जीवन का सबसे बड़ी जो समस्या है वह है विश्वास की। हम किस पर विश्वास करें। विश्वास की हालत यह है कि पिछले दिनों जब मैं देखता हूं आत्महत्याए बढ़ रही हैं। इसका कारण है कि उन्हें अपने स्वयं पर विश्वास नहीं है , जब आदमी का स्वयं से विश्वास उठ जाता है तो वह फिर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है। आज विश्वास की स्थिति यह है कि व्यक्ति किस पर विश्वास करें । रिश्तेदारों पर , धर्म गुरुओं पर , राजनेताओं पर , सरकारी अधिकारियों पर , पत्रकारिता पर या फिर न्यायपालिका किस पर करे। प्रतिदिन हम अखबारों में समाचार पढ़ते हैं कि बेटा-बेटी अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ क्या हालत करता है या बहु अपने सास-ससुर की क्या हालत करती हैं ? फिर उन्हें वृद्धाश्रम की ओर देखना पड़ता है। तो क्या यह हमारे संस्कार हैं ? हमारी संस्कृति ने हमें यह सिखाया है ? जहां पिछले दिनों पारिवारिक दुष्कर्म की बातें भी कई बार आई। यह भी हमारे समाज पर धब्बा है , दाग है। जहां हमारे विश्वास के रिश्ते हैं उन पर बहुत बड़ी चोट है। अभी पिछले दिनों न्यायाधिपति जसराज जी चोपड़ा बता रहे थे एक बेटे ने मां को विदेश अपने साथ ले जाने की बात कही। व...

साधु का लक्षण

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वर्तमान माघ महीने में जहां हरिद्वार में कुंभ की तैयारी है। वहीं प्रयागराज इलाहाबाद में माघ महोत्सव मनाया जा रहा है। वृंदावन में भी एक छोटा कुंभ मनाया जा रहा है। इसी भांति जैनो में तेरापंथ धर्म संघ का महाकुंभ मर्यादा महोत्सव भी माघ महीने में है। इन सब अवसरों पर साधु-संतों के बारे में और उनके दर्शनार्थ हजारों लाखों करोड़ों लोग वहां पहुंचते हैं। उनकी संतता व फक्कडपन को देखकर स्वयं भी संयमित होने का प्रयास करते हैं , मर्यादित होने का प्रयास करते हैं। ऐसे अवसरों पर हमें साधु के महत्व व उनके जीवन दर्शन का भी पता चलता है जो कि जानना हमारे जीवन के लिए भी बहुत जरूरी है। प्रस्तुत पापा जी श्री सोहनराज जी कोठारी (तेरापंथ प्रवक्ता , शासनसेवी , पूर्व न्यायाधीश) का लेख साधु के महत्व के बारे में है हम इस माघ महीने में इससे प्रेरणा लेकर हममें भी संत भाव आये , ये काम्य है। - मर्यादा कुमार कोठारी। साधु सा ही साधे काया:- साधु शब्द की जो परिभाषा इस लोकोक्ति में मात्र दो शब्दों में प्रकट की गई है , वह सचमुच आश्चर्यकारी एवं विलक्षण है। भारतवर्ष में सभी सम्प्रदाय के लाखों साधु-सन्यासी रहते ...

कोरोना काल : तृष्णा का निराकरण

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  ( प्रस्तुत लेख दादाजी सोहन राज जी कोठारी (तेरापंथ प्रवक्ता व शासन सेवो) ने कुछ लोकोक्तियां पर लिखा था। वे लेख अल्प शब्दों में समग्र दर्शन के रूप में थे। उन्हीं में से एक यहां प्रस्तुत है जो वर्तमान कोरोना काल में हमें तृष्णा को दूर करने की शिक्षा देता है। संयमी जीवन जीने तथा दूसरों को देखकर देखा-देखी में ईर्ष्या भाव ना करें। अपने को जितना मिला है उसमें संतोषी रहने का प्रयास करें। यही करोना-काल ने हमें सिखाया भी है , तो यह लेख की कहावत आज भी उतनी ही प्रसांगिक है जितनी कि जब यह कही गई तब थी।)   देख पराई चुपड़ी , क्यूं ललचावे जीव महात्मा कबीर का एक दोहा है जिसका दूसरा पद लोकोक्ति बन चुका है। दोहा इस प्रकार है- रूखा-सूखा खाय के , ठंडा पानी पीव। देखि पराई चुपड़ी , क्यूं ललचावे जीव।।   इस दोहे का सीधा सा अर्थ है कि व्यक्ति को जो कुछ मिल जाए , उसी में संतोष करना चाहिए व दूसरों की समृद्धि देखकर ईर्ष्याभाव या लालच नहीं लाना चाहिए। भारतीय दर्शन में संतोष को अत्यधिक महत्व दिया गया है और वस्तुतः जीवन को सुखी बनाने के लिए यह एक अमोघ मंत्र है। संतोष की महत्त्ता व्यक्त करते ...