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स्वावलंबन

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  स्वल्प शब्दों में समग्र दर्शन के   अंतर्गत   कहावतों पर पापा   सोहन राज जी कोठारी द्वारा लिखे गए लेख द्वारा बताया गया कि स्वावलंबन व श्रम कितना जरूरी है। हम वर्तमान परिपेक्ष में देखें तो इस कोरोना काल ने स्वावलंबन पर सचेत कर दिया।   वही सुखी है जो स्वाबलंबी है , अन्यथा कष्ट उठाने पड़ेंगे । इस लोकोक्ति पर उनका लिखा गया यह लेख वर्तमान में भी हमें प्रेरणा दे रहा है । -- मर्यादा कुमार कोठारी बैठक तपे जद सूत कते इस लोकोक्ति को साधारण शब्दों में भी जीवन की सफलता व श्रम का एक महत्वपूर्ण संकेत छिपा है। यह बात सही है कि पुराने जमाने में जब देश भर में गांव स्वावलंबी थे तब कपड़े की बुनाई का सारा कार्य छोटी-छोटी इकाईयों के माध्यम से गांव में ही होता था। गांव-गांव में अनेक घरों पर कार्मिक चरखा कात कर रूई से सूत के डोर बनाते , जिससे अन्य कार्मिक अपने घरों में ताना-बाना के पट लगाकर बुनाई करते , कपड़ा तैयार करते। उससे गांव की आवश्यकता पूरी हो जाती। विशिष्ट कलाविद कार्मिक इसी प्रकार रेशम व ऊन कातकर रेशमी व ऊनी कपड़ों की बुनाई करते , उस पर अपनी कलात्मकता का प्रयोग करते। जिससे ...

संबंधों की व्याख्या: आधुनिक संदर्भ में

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जब से मनुष्य ने समूह में रहना आरंभ किया है , मनुष्य संबंधों की डोर से बंधा हैं। पति-पत्नी , माता-पिता , भाई-बहन , मित्र इत्यादि अनेकानेक संबंधों से हम जीवन पर्यन्त जुड़े रहते है। मानव सभ्यता के प्रारंभिक वर्षों से 18वीं शताब्दी तक इन संबंधों का निर्वहन लगभग निर्बाध रूप से एक समान होता रहा , परिवार समाज की मर्यादा ही व्यक्ति के लिए नैतिक कानून रहे एवं इसके अनुपालन में ही जीवन यापन होता था। इस काल खंड में सबसे बड़ा परिवर्तन स्त्रियों की दशा में आया था , प्राचीन काल में आर्थिक ,   सामाजिक और राजनीतिक रूप से जितनी स्त्रियां स्वतंत्र थी , ईसा के 1000 वर्ष बाद ,   स्त्रियां धीरे-धीरे दोयम दर्जे की बन गई एवं समाज में पितृसत्ता की स्थापना हुई । 18वीं शताब्दी के समय यूरोपियन प्रजा धीरे-धीरे एशिया , अफ्रीका एवं विश्व के अन्य भागों में व्यापारिक कार्यों के लिए जाने लगी , यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई तथा यहीं से यूरोप का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पूरी मानव सभ्यता पर पड़ा। स्त्रियों में चेतना जागृत होने लगी , निरंतर चलने वाले युद्धों में पुरुषों के रत रहने के कारण घरेलू एवं साम...