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कोरोना काल : तृष्णा का निराकरण

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  ( प्रस्तुत लेख दादाजी सोहन राज जी कोठारी (तेरापंथ प्रवक्ता व शासन सेवो) ने कुछ लोकोक्तियां पर लिखा था। वे लेख अल्प शब्दों में समग्र दर्शन के रूप में थे। उन्हीं में से एक यहां प्रस्तुत है जो वर्तमान कोरोना काल में हमें तृष्णा को दूर करने की शिक्षा देता है। संयमी जीवन जीने तथा दूसरों को देखकर देखा-देखी में ईर्ष्या भाव ना करें। अपने को जितना मिला है उसमें संतोषी रहने का प्रयास करें। यही करोना-काल ने हमें सिखाया भी है , तो यह लेख की कहावत आज भी उतनी ही प्रसांगिक है जितनी कि जब यह कही गई तब थी।)   देख पराई चुपड़ी , क्यूं ललचावे जीव महात्मा कबीर का एक दोहा है जिसका दूसरा पद लोकोक्ति बन चुका है। दोहा इस प्रकार है- रूखा-सूखा खाय के , ठंडा पानी पीव। देखि पराई चुपड़ी , क्यूं ललचावे जीव।।   इस दोहे का सीधा सा अर्थ है कि व्यक्ति को जो कुछ मिल जाए , उसी में संतोष करना चाहिए व दूसरों की समृद्धि देखकर ईर्ष्याभाव या लालच नहीं लाना चाहिए। भारतीय दर्शन में संतोष को अत्यधिक महत्व दिया गया है और वस्तुतः जीवन को सुखी बनाने के लिए यह एक अमोघ मंत्र है। संतोष की महत्त्ता व्यक्त करते ...

आत्मनिर्भर भारत- परिस्थिति की मांग

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कोविड-19 की महामारी के कारण से वैश्विक अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के संकेत आए है , प्रत्येक राष्ट्र दूसरे देश पर निर्भर कम से कम होना चाहता है ओर ऐसी परिस्थिति में "आत्मनिर्भर भारत" एक चर्चा का विषय बना है हम इसमें चर्चा करें उससे पूर्व भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है। ईसा की सोलहवीं शताब्दी तक भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में सिरमौर थी , भारत की समृद्धि एवं ज्ञान दूसरे देशों के व्यापारियों एवं ज्ञानार्थीओं को भारत की ओर आकर्षित करते थे। भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत होने का सबसे बड़ा कारण था भारत के गांव- जनपद आत्मनिर्भर थे , अपने जरूरत की वस्तुओं का निर्माण एवं विपणन स्वयं ही करते थे , जनपद का कृषक स्वयं के उपभोग का अनाज रखकर बाकी स्थानीय स्तर पर बेच देता था , ग्राम का महाजन बैंकिंग आवश्यकताओं की पूर्ति करता था , अन्य सेवा प्रदाता (कुंभकार , लोहार , चमड़े का कार्य करने वाले , मिस्त्री आदि ) भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध थे , गांधी जी के ग्राम स्वराज की यही कल्पना थी। इस समय भारतवर्ष का व्यापार मध्य एवं पूर्व एशिया के देशों में होता था। वा...